बिहार में एक बार फिर 'भूमिहार' बनाम 'भूमिहार ब्राह्मण' की पहचान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। विधानसभा के मानसून सत्र में यह मुद्दा दोबारा उठने के बाद पूरे राज्य में चर्चा का विषय बन गया है। भूमिहार समाज के विभिन्न संगठन सरकार से मांग कर रहे हैं कि सभी सरकारी दस्तावेजों, जाति प्रमाण पत्रों और आगामी राष्ट्रीय जाति जनगणना में उनकी पहचान 'भूमिहार ब्राह्मण' के रूप में दर्ज की जाए।
विधानसभा में पूर्व मंत्री एवं विधायक जीवेश मिश्रा ने सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट कराते हुए कहा कि राजस्व अभिलेखों, पुराने खतियानों, जिला गजेटियर और ऐतिहासिक दस्तावेजों में समुदाय का उल्लेख 'भूमिहार ब्राह्मण' के रूप में मिलता है, जबकि वर्तमान जाति प्रमाण पत्र और जाति सर्वेक्षण में केवल 'भूमिहार' लिखा जा रहा है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
1911 की जनगणना से शुरू हुई आधिकारिक पहचान
इतिहास के अनुसार, वर्ष 1911 की ब्रिटिश भारत की जनगणना में पहली बार समुदाय को आधिकारिक रूप से 'भूमिहार ब्राह्मण' के रूप में दर्ज किया गया था। इससे पहले प्रधान भूमिहार ब्राह्मण सभा सहित कई सामाजिक संगठनों ने इस पहचान के लिए अभियान चलाया था।
बाद में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने वर्ष 1916 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'भूमिहार ब्राह्मण परिचय' में ऐतिहासिक और शास्त्रीय आधार प्रस्तुत करते हुए इस समुदाय को अयाचक ब्राह्मण परंपरा से जोड़ने का प्रयास किया।
2023 के जाति सर्वेक्षण के बाद बढ़ा विवाद
विवाद ने नया रूप तब लिया जब 2023 के बिहार जाति सर्वेक्षण में 'भूमिहार ब्राह्मण' के बजाय केवल 'भूमिहार' दर्ज किया गया। समाज के कई संगठनों ने आरोप लगाया कि एक ही समुदाय को अलग-अलग नामों—भूमिहार, भूमिहार ब्राह्मण, भुइनहार और भुइयार—में दर्ज किए जाने से उनकी वास्तविक आबादी और पारंपरिक पहचान प्रभावित हुई।
समाज का कहना है कि अन्य जातियों को एक नाम से दर्ज किया गया, जबकि उनके समुदाय को कई श्रेणियों में विभाजित कर दिया गया।
सरकार के फैसलों पर भी उठे सवाल
भूमिहार समाज का तर्क है कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड, खतियान और 1931 की जनगणना सहित कई ऐतिहासिक अभिलेखों में उनकी पहचान 'भूमिहार ब्राह्मण' के रूप में दर्ज है।
इसी बीच, वर्ष 2025 में तत्कालीन राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने राजस्व अभिलेखों और ऑनलाइन पोर्टल पर 'भूमिहार ब्राह्मण' विकल्प शामिल करने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा था कि पुराने अभिलेखों से 'ब्राह्मण' शब्द हटाने का अधिकार किसी को नहीं है।
विधानसभा में फिर उठा मुद्दा
24 जुलाई 2026 को बिहार विधानसभा में जीवेश मिश्रा ने सरकार से मांग की कि सरकारी दस्तावेजों, जाति प्रमाण पत्रों और अन्य अभिलेखों में 'भूमिहार ब्राह्मण' ही लिखा जाए ताकि विभिन्न सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियां समाप्त हो सकें।
हालांकि, सरकार की ओर से इस विषय को विचाराधीन बताए जाने के बाद कई जनप्रतिनिधियों ने नाराजगी जताई।
विधायक विशाल प्रशांत ने उठा दी अनुसूचित जनजाति की मांग
मामले पर सरकार की प्रतिक्रिया से असंतुष्ट विधायक विशाल प्रशांत ने विधानसभा में कहा कि यदि सरकार समुदाय की पारंपरिक पहचान को मान्यता नहीं देना चाहती, तो उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने पर विचार किया जाए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है।
2027 की राष्ट्रीय जनगणना से पहले बढ़ा दबाव
भूमिहार समाज के कई संगठन चाहते हैं कि 2027 की राष्ट्रीय जाति जनगणना से पहले सरकार आधिकारिक रूप से समुदाय का नाम 'भूमिहार ब्राह्मण' दर्ज करे। उनका कहना है कि इससे ऐतिहासिक अभिलेखों और वर्तमान सरकारी रिकॉर्ड में एकरूपता आएगी।
Bihar Dastak Analysis
भूमिहार बनाम भूमिहार ब्राह्मण का विवाद केवल नाम का नहीं, बल्कि ऐतिहासिक पहचान, सरकारी अभिलेखों और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में सरकार इस विषय पर क्या निर्णय लेती है, उस पर बिहार की राजनीति और सामाजिक समीकरण दोनों की नजर बनी रहेगी।
(नोट: यह समाचार विभिन्न सार्वजनिक दावों, ऐतिहासिक संदर्भों और विधानसभा में उठाए गए बयानों पर आधारित है। अलग-अलग पक्षों के ऐतिहासिक एवं सामाजिक दावों पर विद्वानों और संगठनों के बीच मतभेद भी मौजूद हैं।)
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